ravindranath tagore

SUNO SABKI PARANTU KRO APNE MAN KI ( सुनो सबकी परन्तु करो अपने मन की )

बहुत समय पहले की बात है | एक  नगर  में  एक साहूकार रहता था | वो  नित्य भगवान्  के   मंदिर जाकर पूजा किया करता था |एक दिन वो बहुत दुखी था | तब  उसके मन में विचार  आया की मै और मेरी पत्नी कही तीर्थ यात्रा पर जाये | और कुछ पुन्य कमा ले |

तभी दोनों पति – पत्नी  ख़ुशी – ख़ुशी तीर्थ यात्रा के लिए निकल जाते है |और साथ में अपने चहेते घोड़े को भी ले जाते है | नगर से कुछ दूर  चले जाने पर उन्हें मार्ग में कुछ ऐसे लोग मिले |जो साहूकार और उसकी पत्नी को देखकर आपस में कहने लगे की हे भगवान् – ये साहूकार कितना निर्दयी है की खुद घोड़े  पर बैठा है | और नाजुक सी धर्म पत्नी को कड़ी धूप , तपती भूमि पर पैदल चला रहा है |

इस बात को सुनकर साहूकार लज्जित हो गया |और उसने अपनी पत्नी से घोड़े  पर बेठने के लिए आग्रह किया और जिद करके अपनी पत्नी को घोड़े पर बैठा दिया और खुद पैदल चलने लगा | तभी नगर से दूर दुसरे नगर में पहुचने पर उन्हें मार्ग में पुनः कुछ मुशाफिर मिले| और वे आपस में उन्हें देखकर बाते करने लगे | और वो कहने लगे की हे भगवान् – देखो क्या जमाना आ गया है की पत्नी सवयं घोड़े पर बैठी है और अपने पति परमेश्वर को कड़ी धूप में पैदल चला रही है |

ये कथन सुनकर साहूकार और उसकी पत्नी दोनों बहुत लज्जित हुए | तभी दोनों ने एक साथ घोड़े पर बैठने का निश्चय किया और और दोनों एक साथ घोड़े पर बैठकर तीर्थ यात्रा करने लगे | काफी दूर चलने के पश्चात् दोनों एक गाँव में पहुंचे | तभी उन्हें कुछ बुजुर्ग लोग मिले |और उन्हें देखकर कहने लगे की हे राम – देखो केसे निर्दयी पति – पत्नी   है| की तपती धूप में  बेजुबान जानवर के ऊपर बैठे  हुए यात्रा कर रहे है | जिस कारन लग रहा है की कुछ दूर चलकर ये बेजुबान जानवर प्राण त्याग देगा | जिससे इनकी यात्रा का पुन्य इन्हें नहीं मिलेगा |

तभी साहूकार और  उसकी पत्नी ये शब्द सुनकर बहुत दुखी हुए और दोनों ने पैदल चलने का निर्णय लिया | और तीर्थ यात्रा के  लिए घोड़े को साथ लेकर पैदल चलने लगे |तभी तीर्थ धाम के  निकट पहुँचते ही कुछ तीर्थ यात्री मिले और आपस में कहने लगे कि देखो भगवान् – ये केसे बेवकूफ पति – पत्नी है | की इतनी धूप में तपती भूमि में घोडा होते हुए भी पैदल यात्रा कर रहे है |

मार्ग में मिले अनेक तीर्थ यात्रियों की ये अलग – अलग बाते सुनकर साहूकार और उसकी पत्नी ने गहराई से सोच – विचार किया  और अंत में निर्णय लिया की सभी का अलग – अलग सोचने का  नजरिया होता है | इसलिए सब अलग – अलग बाते कर रहे है |ये लोग किसी  को भी नहीं छोड़ते अप्सब्ध कहने से और कोई मोका नहीं छोड़ते कलंक लगाने का |इसलिए   ये सब जानकर वे मन ही मन मुस्कुराये और आपस में कहने लगे की हमें किशी की बातो में ध्यान न देकर अपने कर्म करते रहना चाहिए  | कर्मो का फल देने वाला इश्वर है | तभी साहूकार और उसकी पत्नी सब कुछ ईश्वर पर छोड़कर आगे की यात्रा क लिए निकल जाते है |

इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है की कभी किसी  की बातो में नहीं आना चाहिए  |अच्छे कर्म करते रहना चाहिए और फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए | अच्छे कर्मो का  फल अच्छा होता है | इसलिए कहा गया है की , “सुनो सबकी परन्तु करो अपने मन की” |

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Post Author: Pooja Aggarwal