NAVRATRI KE CHOUTHE DIN KUSMANDAROOP KI POOJA

नवरात्री के चौथे दिन कुष्मांडा देवी रूप की पूजा-NAVRATRI KE CHOUTHE DIN KUSMANDA MATA ROOP KI POOJA

 

NAVRATRI KE CHOUTHE DIN KUSMANDAROOP KI POOJA
NAVRATRI KE CHOUTHE DIN KUSMANDAROOP KI POOJA

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एक समय की बात है बृहस्पति जीने ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मन ! आप अत्यंत बुद्धिमान, सर्वशास्त्र ज्ञानी और चारों वेदों को जानने वाले हैं| हे प्रभु कृपया कर मुझे बताये की चैत्र व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत क्यूँ किया जाता है? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? पहले इस व्रत को किसने किया ? बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले – हे बृहस्पते! तुमनेजग के कल्याण हेतु बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है| जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं वे मनुष्यसभी सुखो को भोगते हुए वकुंथ धाम को जाते है |

नवरात्र में क्या करें और क्या काम ना करें

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नवरात्रि के नौ दिनों में से हर दिन का अलग महत्‍व होता है। हर दिन देवी मां के अलग स्‍वरूप की पूजा होती है और सभी की आराधना एक भिन्‍न भाव से की जाती है। माता को समर्पित सभी नौ दिन, मानवता के लिए होते हैं लेकिन विशेषताएं अलग होती हैं।

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नवरात्रि वर्ष में चार बार पड़ती है- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन. नवरात्रि से वातावरण में तमस का अंत होता है और सात्विकता की शुरुआत होती है. मन में उल्लास, उमंग और उत्साह की वृद्धि होती है.

दुनिया में सारी शक्ति, नारी या स्त्री स्वरूप के पास ही है, इसलिए इसमें देवी की उपासना ही की जाती है.

नवरात्रि स्पेशल: पहले दिन देवी के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्रि स्पेशल: दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्रि स्पेशल: तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्री के चौथे दिन कुष्मांडा देवी रूप की पूजा-

कुष्मांडा देवी

चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रुप में बताया गया है। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के कई तरह के रोग मिट जाते हैं। मां की उपासना से आयु,यश और बल बढ़ता है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, देवी कूष्माण्डा अपनी मंद हंसी से संपूर्ण ब्रह्माण्ड को मोहित किए रहती हैं. उनकी वही मंद हंसी ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति का कारण भी है. कहते हैं, जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी. सर्वत्र अंधकार ही अंधकार व्याप्त था. तब देवी कूष्माण्डा ने अपनी अपनी अल्प मुस्कान (ईषत हास्य) से इस चराचर ब्रह्माण्ड की रचना की थी. इसलिए वे सृष्टि की आदिस्वरूपा होने के साथ आदिशक्ति भी हैं.

कुष्मांडा देवी का इतिहास

दुर्गा सप्तशती के अनुसार, देवी दुर्गा अपने कुश्मंद के अवतार से बहुत प्रसन्न थे। यह माना जाता है कि शक्ति या आदि-पराशक्ति की सर्वोच्च देवी, भगवान शिव के शरीर के बाईं ओर से सिद्धधित्री के रूप में प्रकट हुई थी।
सिद्धधित्री के रूप लेने के बाद, देवी पार्वती सूर्य के मूल के अंदर जीवना शुरू कर दी थी, इसलिए इसे कुश्मन्दा देवी के रूप में जाना जाने लगा। इसका अर्थ है कि कुश्मन्दा देवी एकमात्र देवी है जो सूर्य के मूल में रहता है, जहां से वह संपूर्ण सौर मंडल को नियंत्रित करता है। मान्यता है कि जो साधक परम श्रद्धा और शुचिता से इस देवी की भलीभांति आराधना करता है, उसका व्यक्तित्व सूर्य के समान प्रखर और तेजोमय हो जाता है. उसे सर्वत्र प्रसिद्धि मिलती है, हर प्रकार के भय का नाश हो जाता है.
अष्टभुजा देवी के रुप में हैं पूजित

आठ भुजाएं होने के कारण देवी कूष्माण्डा अष्टभुजा देवी के रुप में विख्यात हैं. इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है, जबकि आठवें हाथ में सभी निधियों और सिद्धियों को देने वाली जपमाला है.
पूजा में उपयोगी खाद्य साम्रगी- चतुर्थी के दिन मालपुए का नैवेद्य अर्पित किया जाए और फिर उसे योग्य ब्राह्मण को दे दिया जाए। इस अपूर्व दान से हर प्रकार का विघ्न दूर हो जाता है। इस दिन भी सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात माता के साथ अन्य देवी देवताओं की पूजा करनी चाहिए, इनकी पूजा के पश्चात देवी कूष्माण्डा की पूजा करनी चाहिए। पूजा की विधि शुरू करने से पूर्व हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम करना चाहिए तथा पवित्र मन से देवी का ध्यान करते हुए “सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च. दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे.”नामक मंत्र का जाप करना चाहिए।

कुष्मांडा देवी पूजन मंत्र

माँ कूष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए भक्त को इस श्लोक को कंठस्थ कर नवरात्रि में चतुर्थ दिन इसका जाप करना चाहिए।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

मां कूष्मांमडा का विशेष प्रसाद क्या है?
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो मां को उनका उनका प्रिय भोग अर्पित करने से मां कूष्मांथडा बहुत प्रसन्न होती हैं….
मां कुष्मांडा को मालपुए का भोग लगाएं
इसके बाद प्रसाद को किसी ब्राह्मण को दान कर दें और खुद भी खाएं

नवरात्री के पंचम दिन स्कंदमाता रूप की पूजा-NAVRATRI KE PANCHAM DIN SKANDAMATA ROOP KI POOJA

Post Author: Seema Gupta