px Savitri and Satyavan

सावित्री ने यमराज से केसे बचाए अपने पति(सत्यवान ) के प्राण

नमस्ते दोस्तों ! आज बहुत ही खास दिन है | आज सावित्री वट अमावश्या  है | और आज हम आपकोबताएँगे की सावित्री ने यमराज से केसे बचाए अपने पति के प्राण |

महाभारत ग्रन्थ में बहुत सी पोराणिक धार्मिक  कथाओ का वर्णन मिलता है |जिसमे पतिव्रता सती सावित्री और सत्यवान की कथा का अपना ही एक विशेस महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है |जिसका वर्णन महाभारत के वनपर्व में मिलता है |जब युधिस्ठिर , मार्कंडेय रिशिमुनी  से पूछते है |की  इस लोक में कोई दूसरी ऐसी स्त्री है जो द्रोपदी की तरह पतिव्रता और भक्ति भाव रखने वाली हो | और जिसका जीवन बचपन से राजकुल में व्यतीत हुआ हो | और विवाह करने के पश्चात पतिव्रता धर्म निभाने के लिए वो जंगलो में भटकती रही हो | यह सब सुनने के पश्चात मार्कंडेय ऋषि मुनि , युधिस्थर को कहते है की द्रोपदी से भी बहुत समय पहले एक ऐसी ही सुन्दर , सुशील, पतिव्रता स्त्री सावित्री थी | जिसके सोंदर्य के चर्चे जगत में फेले हुए थे |जो अपने पति धरम के  लिए अपना भक्ति का प्रदर्शन कर चुकी है |और रिषिमुनी , युधिस्ठिर को कथा सुनना प्रारंभ करते है –

मद्रदेश नाम का एक राज्य था | जिसके राजा  का नाम अश्वपति था | अश्वपति की एक बहुत ही सुन्दर पुत्री थी | जो सोंदर्य से परिपूरण थी | लोग उसकी सुन्दरता की तारीफ करते थकते नहीं थे | लेकिन एक ऋषि दुआर उसे श्राफ मिला था की जिस व्यक्ति से सावित्री का विवाह होगा | वो व्यक्ति विवाह के एक साल पश्चात म्रत्यु को प्राप्त हो जायेगा |

अब धीरे – धीरे सावित्री विवाह योग्य होने लगी तब उसके पिता को उसके लिए योग्य वर की चिंता सताने लगी | अपने पिता को इस तरह चिंतित देखकर सावित्री ने स्वयं ही अपने लिए वर तलासने का निर्णय लिया | और वर खोजने के लिए निकल गयी |

तभी चलते – चलते घने  वन में पहुंची | और सावित्री ने  देखा की वन में छोटी सी कुटिया बनी थी | जिसमे दो दृष्टिहीन वृद्ध राजा रानी अपने एक नोजवान पुत्र सत्यवान के साथ रह रहे थे | वो दृष्टिहीन वृद्ध द्युमत्सेन था |जो अपना राजपाठ खो चूका था  |सत्यवान अपने माता – पिता को बहुत प्रेम करता था और पूरण भक्ति भाव से उनकी सेवा किया करता था | सत्यवान रोज जंगल जाता और लकड़ियाँ काट कर बेचता और उसी पैसे से अपना और अपने माता – पिता का पेट भरता था |

तभी सावित्री ने निर्णय  लिया | की मै इसी व्यक्ति से विवाह करूंगी | तभी ये सोचकर सावित्री अपने पिता के पास वापस लोट जाती है | और पिता को  सारी बात बताती है | लेकिन उसके पिता उसकी बात से सहमत नहीं थे | क्यूंकि सत्यवान बहुत गरीब था | और उन्हें ज्ञात हुआ की सत्यवान की एक साल पश्चात् म्रत्यु हो जाएगी | पर सती सावित्री अपनी बात पर अडिग रही और उसने निर्णय लिया की मै विवाह करूंगी तो सिर्फ सत्यवान से ही , अन्यथा विवाह ही नहीं करूंगी |

बेटी की बातों को सुनकर राजा ने सावित्री को विवाह की अनुमति दे दी | और धूम धाम से सावित्री का विवाह सत्यवान से करवा दिया | अब सावित्री अपने पति और सास ससुर के साथ वन में ही रहने लगी |और सभी मूल्यवान वस्त्रो और आभुशनो का त्याग कर अपने पति और सास ससुर के जेसे सादे वस्त्र पहन लिए |अब सावित्री भक्ति भाव और पवित्र मन से अपने ससुराल वालों की सेवा करती रहती थी |

अब धीरे – धीरे समय बीतता जा रहा था | और साल समाप्त होने वाला था |तभी सावित्री को ध्यान आया की सत्यवान की आयु पूरण होने वाली है | और सावित्री ने व्रत रखने का निर्णय लिया |और कुछ दिन पूर्व पवित्र भाव से  व्रत रखने लगी | वर्स के अंतिम दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने  के लिए जाने लगा तो , सावित्री ने सत्यवान के साथ जाने का आग्रह किया | लेकिन सत्यवान ने साथ ले जाने के लिए इंकार कर दिया | पर पत्नी के बार – बार  जिद करने पर वह तैयार हो गया | अब दोनों पत्नी जंगल में लकड़ी बिन रहे थे | तभी सत्यवान को  चक्कर  आया और सत्यवान जमीं पर गिर गया | सावित्री को महसूस हुआ और उसने पति का सर अपनी गोद में रख लिया | और सर को सहलाने लगी |

तभी सावित्री की निगाह सामने पड़ी| उसने देखा की सामने से एक विचित्र प्राणी आ रहा है| जो भैंसे पर बैठा था | जिसकी काले रंग की विशाल भुजाये थी | जब वो उसके पति को खींचकर ले जा रहे थे| तब सावित्री ने  पूछा | हे नाथ ! आप मेरे पति को कहाँ ले जा रहे है | तब यमराज ने उत्तर दिया | मै यमराज हूँ |अब  आपके पति की आयु समाप्त हो गयी है | अब में इन्हें ले जाने आया हूँ | आपके  शतित्व के सामने मेरे दूत नहीं आ सके इसलिए मै स्वयं इन्हें लेने आया हूँ | आप पतिव्रता स्त्री है |  आप चाहे तो आप मुझसे कोई भी वरदान मांग सकती हो | तब सावित्री ने यमराज से अपने सास ससुर की आँखे मांग ली | यम ने तथास्तु कह दिया |अब उसके सास ससुर के नेत्र ठीक हो गये | जब यमराज सावित्री के पति को दक्षिण दिशा की और ले जाने लगे | तब सावित्री भी उन के पीछे – पीछे  चल पड़ी | तब यमराज ने सावित्री को कहा की तुम हमारे साथ नहीं चल सकती |सावित्री ने यमराज से कहा जहा पति जायेंगे मै भी वही जाउंगी | तब यम ने बार – बार मना किया और कहा तुम चाहो तो दूसरा वरदान मांग लो |तब सावित्री ने अपने सास ससुर का राजपाठ मांग लिया और यमराज ने तथास्तु कह दिया | और उनका राज्य उन्हें मिल गया | तब यमराज ने इसी तरह तीसरा वर भी मांगने के लिए कहा – सावित्री ने यम से कहा  मेरे पिता के कोई पुत्र नहीं है मेरे पिता को 100 पुत्र हो | यम ने तथास्तु कहा | फिर यमराज सावित्री के पति को खीचकर ले जाने लगे | सावित्री फिर से यम के पीछे चलने लगी | ये देखकर यमराज ने सावित्री को बहुत समझाया और घर वापस लोट जाने आग्रह किया | परन्तु वो नहीं मानी | यम ने सावित्री को एक और वरदान मांगने के लिए कहा – अब सावित्री ने यम से कहा की मुझे सत्यवान  से 100 यशस्वी पुत्र उत्पन्न होने का वरदान दे | और यम ने कहा  तथास्तु |  और सत्यवान को लेकर आगे बढ़ गये |तभी सावित्री बोली – हे देव ! आप मुझे 100यशस्वी पुत्रो का वरदान दे रहे हो और मेरे   पति को अपने साथ ले  जा रहे हो | तब ये केसे संभव है | जब मेरे पति ही नहीं होंगे तो मेरे लिए सब निरर्थक है |  और मेरे जीवित रहने का कोई तात्पर्य नहीं | मेरा मर जाना ही उचित है |

ये सब सुनकर यमराज ने सत्यवान के शरीर को पुनह जीवित कर दिया | और सावित्री को सत्यवान के साथ वापस लोटने के लिए कहा | अब सवित्री ख़ुशी – ख़ुशी अपने पति के साथ वापस लोट जाती है |

आज भी सावित्री की पतिव्रता की कहानी का बहुत महत्व है | स्त्री  आज के दिन व्रत करती है और वट व्रक्ष की पूजा करके अपने पति की दीर्घ आयु की कामना करती है |

 

Post Author: Pooja Aggarwal