सती के विकराल रूप से डरकर क्यों भागे भगवान् शंकर

देवी सती ब्रह्मा पुत्र , प्रजापति दक्ष की पुत्री और भगवान् शिव की प्रथम धर्मपत्नी थी | देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यहाँ पति का अपमान होने पर यज्ञ में कुद्कर अपने प्राणों को त्याग कर दिया था | ये बात तो आप सभी जानते ही है | लेकिन मै आज आपको देवी पुराण के इस प्रसंग के बारे में रोचक तथ्य के साथ देवी सती के विकराल रूप से डरकर भगवान शंकर भागने लगे |

कथा – देवी पुराण के अनुसार देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो उन्होंने श्रृष्टि के सभी देवी देवता को बुलाया | परन्तु अपनी पुत्री और दामाद भगवान शिव को निमंत्रण नही दिया | यज्ञ के बारे मै जब जानकर देवी सती बिना निमंत्रण ही पिता के घर यज्ञ मै जाने की भगवान् शिव से जीद करने लगी |

तब भगवान् शिव ने देवी सती से कहा की किसी भी सुभ कार्य में बिना बुलाये जाना और म्रत्यु ये दोनों ही एक समान है | मेरा अपमान करने की इच्छा से ही तुम्हारे पिता ये महायज्ञ कर रहे है | ससुराल में अपमान होता है तो वह मृत्यु से भी बढ़कर होगा |

देवी पुराण के अनुसार भगवान् शिव के मुख से ये बात सुनकर देवी सती बोली -महादेव आप वहाँ जाए या न जाये लेकिन मै वह अवश्य जाउंगी | पिता के घर में महायज्ञ के महोत्सव के समाचार सुनकर कोई कन्या धर्य रखकर अपने घर में केसे रह सकती है |

देवी सती के ऐसे कहने पर शिव जी ने कहा – मेरे रोकने पर भी तुम नही सुन रही  हो | दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं गलत कार्य कर दुसरो पर दोष लगाता है | अब मेने जान लिया है की तुम मेरे कहने – सुनने में नही रह गयी हो | अतः अपनी इच्छा अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो |

जब महादेव ने बात कही तो देवी सती थोड़ी देर विचार करने लगी की महादेव ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी | लेकिन अब ये मेरा अपमान कर करे है | इसलिए अब मै इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूँ | यह सोचकर देवी सती ने अपना रोद्र रूप धारण कर लिया | जिसको देखकर महादेव ने अपने नेत्र बंद कर लिए | विकराल दाढो से युक्त मुखवाली भगवती ने अचानक उस समय अट्टाहस किया | जिसे सुनकर भगवान् शिव भयभीत हो गये | बड़ी कठिनाई से नेत्रों को खोलकर उन्होंने भगवती के इस भयंकर रूप को देखा |

देवी भगवती के इस विकराल रूप को देखकर भगवान् शिव भय के मारे इधर – उधर भागने लगे | शिव को दौड़ते हुए देखकर देवी सती ने कहा – डरो मत | इस शब्द को सुनकर शिव अत्यधिक डर के मारे वहाँ एक छन् भी नही रुके | और बहुत तेजी से भागने लगे |

तब इस प्रकार अपने स्वामी को भयभीत देख देवी भगवती अपने दश श्रेष्ट रूप धारण कर सभी दिशाओ में स्थित हो  गयी | महादेव जिस और  भी जाते उस दिशा में वे विकराल रूप वाली भगवती को ही पाते | तब भगवान् शिव ने अपने नेत्र बंद कर लिए  और वहाँ पर ठहर गये |

जब भगवान शिव ने अपने नेत्र खोले तो उन्होंने अपने सामने स्याम वर्ण वाली भगवती काली को देखा | तथा तब उन्होंने पूछा श्याम वर्ण वाली देवी आप कोन हो और मेरी प्रिय सती कहा चली गयी | तब देवी काली बोली – क्या अपने सामने स्थित मुझ सती को आप नही देख रहे है | ये जो अलग – अलग दिशाओ में स्थित है ये मेरे ही रूप है | इनके नाम काली , तारा , लोकेशी , कमला , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , षोडशी , तिपुरसुन्दरी , बगलामुखी , धूमावती और मातंगी है |

देवी सती के वचन सुनकर भगवान् शिव बोले – मै आपको पूर्ण तथा प्राप्रकृति के रूप में जान गया हु | अतः अज्ञानता वश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है , उसे छमा करे ऐसा कहने पर देवी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा की यदि मेरे पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में आपका अपमान हुआ तो मै उस यज्ञ को कभी सफल नही होने दूंगी | ऐसा कहकर देवी सती अपने पिता के यज्ञ में चली गयी |

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Post Author: Pooja Aggarwal