माँ दुर्गा के नवरात्र व्रत की कथा

माँ दुर्गा के नवरात्र व्रत की कथा

 

 माँ दुर्गा के नवरात्र व्रत की कथा

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दोस्तों आज हम मा दुर्गा के नवरात्र व्रत की कथा bookbaak.com पर पड़ेंगे | देवी के ये दिन बहुत ही पावन और पवित्र है | कहते है की माता रानी इन दिनों अपने भक्तो के दुःख दूर करने धरती पर आती है | दोस्तों जो लोग पुरे व्रत रहते है उन्हें यह कथा रोज पूजा क समय पदनी चाहिए| तो दोस्तों कथा शुरू करते है |

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एक समय की बात है बृहस्पति जीने ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मन ! आप अत्यंत बुद्धिमान, सर्वशास्त्र ज्ञानी और चारों वेदों को जानने वाले हैं| हे प्रभु कृपया कर मुझे बताये की चैत्र व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत क्यूँ किया जाता है? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? पहले इस व्रत को किसने किया ? बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले – हे बृहस्पते! तुमनेजग के कल्याण हेतु बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है| जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं वे मनुष्यसभी सुखो को भोगते हुए वकुंथ धाम को जाते है |

तो ब्रहास्पते इस व्रत कथा का पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ, तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो. ब्रह्माजी कहते हैं – एक नगर था जिसका नाम पीठत था, उसमें अनाथ नाम का ब्राह्मण निवास करता था| वह मा भगवती दुर्गा का अनन्य भक्त था| उसके यहाँ  संपूर्ण सद्गुणों से युक्त एक कन्या ने जन्म लिया मानों ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ,  ब्राहमण ने उसका नाम सुमति रखा सुमति अपनी सहेलियों के साथ ऎसे बड़ी होने लगी जैसे की शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती है |

जब सुमति के पिता नियम से प्रतिदिन दुर्गा की पूजा तथा हवन किया करते थे तो उस समय सुमति भी वहाँ उपस्थित रहती थी| एक दिन सुमति अपनी सहेलियों के साथ खेल में लग गयी और भूल गई और मा भगवती के पूजन में उपस्थित न हो सकी तब उसके पिता को सुमति पर बहुत गुस्सा आया और गुस्से में आकर कहने लगे कि हे दुष्ट पुत्री! आज तुम माँ भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई हो इसलिए मैं तुम्हारी शादी किसी कुष्ठी व दरिद्र मनुष्य से कर देता हु | पिता के ऐसे वचन सुनकर सुमति को बहुत दुःख हुआ और वो कहने लगी कि हे पिताजी ! मैं आपकी पुत्री हूँ और सब तरह से आपके अधीन हूँ इसलिए आप मेरी शादी जिस किसी से कराना चाहे कर सकते हैं क्योंकि होगा तो वही है जो मेरे भाग्य में लिखा है| मुझे तो भाग्य पर पूर्ण विश्वास है|

सुमति कहती है कि मनुष्य कितने मनोरथों को पूरा करना चाहता है लेकिन होता तो वही है जो भाग्य विधाता भाग्य में लिखकर देते हैं| जो जैसा कर्म करता है उसको फल भी उन कर्मो के अनुसार ही मिलते हैं| मनुष्य के हाथ में केवल कर्म करना है और उसका फल देना भगवान के हाथ में होता है| अपनी कन्या के मुख से ये निर्भयपूर्ण बातें सुनकर ब्राह्मण का गुस्सा बढ़ गया  जाता है और अपनी पुत्री का विवाह एक कुष्ठ रोगी से कर दिया | और अपनी पुत्री से कहा कि अब जाओ और अपने कर्म का फल भोगो, मैं भी देखता हूँ कि तुम भाग्य के भरोसे रहकर कैसे जीवनयापन करती हो?

पिता के वचनों को सुन सुमति सोचने लगी कियह मेरा कैसा दुर्भाग्य है कि मुझे ऎसा पति मिला और अपने दुखों के बारे में सोचती हुयी | सुमति वन की ओर चल पड़ी. उस भयानक वन में उसने घास पर रात बिताई | गरीब सुमति की हालत देखकर देवी मा भगवती उसकेपिछले जन्म के पुण्यों के कारण सुमति के सामने प्रकट हुयी और कहा – हे दीन ब्राह्मणी ! मैं तुम पर तुम्हारे पिछले जन्म के पुण्य पभाव से प्रसन्न हूँ | तुम जो चाहो वह वर माँग लो , मैं तुम्हें सब दूँगी| भगवती दुर्गा के एसे वचन सुनकर सुमति कहने लगी – आप कौन है? जो मुझ पर प्रसन्न हैं|  ब्राह्मणी की बात सुनकर देवी कहने लगी कि मैं आदि शक्ति हूँ, मैं ही ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूँ| प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर कर उन्हें सुख प्रदान करती हूँ| मैं तुझसे तेरे पूर्व पुण्यों के कारण प्रसन्न हूँ|

देवी ने बताया कि तुम पूर्व जन्म में निषादराज की पत्नी थी और अत्यधिक पतिव्रता थी | एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की और इस चोरी में निषाद के साथ सिपाहियों ने तुम्हे भी पकड़ लिया| और तुम दोनों को जेल में बंद कर दिया और भोजन-पानी भी नहीं दिया| उन दिनों तुमने ना कुछ खाया और ना ही कुछ पीया | इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया| भगवती बोली कि हे पुत्री ! उन नौ दिनों के व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर  प्रसन्न हूँ और तुम्हें तुम्हारी मनोवाँछित वस्तु दे रही हूँ | तुम जो मांगना चाहो माँग लो | भगवती की बात सुनकर ब्राह्मणी बोली – मे आपको बार –बार प्रणाम करती हूँ| क्रपा कर आप मेरे पति और उनके कोढ़ को दूर कर दे | इस पर देवी कहने लगी कि उन दिनों तुमने जो व्रत किया था उसमें से एक दिन के व्रत के पुण्य से तेरे पति का रोग को दूर हो जायेगा और मेरे प्रभाव से तेरा पति का शरीरसुन्दर एवं क्रांतिमय हो जाएगा|

ब्रह्माजी बोले ब्रहस्पति जी से बोले  –  देवी के इस प्रकार के वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत खुश हुई और पति को निरोगी देखने की इच्छा से ठीक है, ऎसे बोली और उसके पति का शरीर भगवती देवी की कृपा से ठीक होकर सोने की कान्ति सा हो गया | पति की मनोहर देह को देखकर ब्राह्मणी देवी को अति पराक्रम वाली समझकर उनकी स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुखों को दूर करने वाली , तीनों लोकों के कष्ट हरने वाली, दुखों का निवारण करने वाली, रोगी को निरोगी करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली और दुष्ट मनुष्यों का नाश करने वाली है आप तो सारे जगत की माता व पिता हो| हे अम्बे माँ ! मेरे पिता ने क्रोध में मेरा विवाह एक कुष्ठी के साथ करके घर से निकाल दिया था | पिता की निकाली हुई बेटी को आपने सहारा दिया

ब्राह्मणी कहती है कि हे देवी!आपने दुखों के इस सागर से आपने मुझे बाहर निकाला है| हे देवी मैं आपको बार-बार प्रणाम करती हूँ | ब्रह्माजी बोले – हे बृहस्पते! सुमति ने मन से देवी की बार –बार स्तुति की और उसकी की हुई स्तुति से देवी को बहुत संतोष हुआ | देवी ने ब्राह्मणी से कहा कि तुम्हारे घर एक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र पैदा होगा जिसका नाम उद्दालक होगा | देवी ब्राह्मणी से कहने लगी – हे ब्राह्मणी तेरी कोई और इच्छा हो तो वह भी माँग लो  ब्राह्मणी कहती है कि हे माँ ! आप अगर मुझसे प्रसन्न हैं तो आप मुझे नवरात्र करने की विधि सविस्तार बताइए| ब्राह्मणी के वचन सुनकर देवी कहती हैं कि मैं तुम्हे संपूर्ण नाशों को दूर करने वाले नवरात्र व्रत की विधि बताती हूँ|

 

देवी कहती हैं कि इसे ध्यानपूर्वक सुनों – आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें| यदि दिनभर व्रत नहीं कर सकते तो एक समय का भोजन कर ले | ब्राह्मणों से पूछकर घटस्थापन करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सीचें| महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्त्तियाँ बनाकर उनकी नित्य प्रति विधि विधान से पूजा-अर्चना करें| पुष्पों से अर्ध्य दे और बिजौरा के पुष्प से अर्ध्य देने पर रुप की प्राप्ति होती है| जायफल से कीर्त्ति, दाख से कार्य की सिद्धि होती है. आँवले से सुख व केले से भूषण की प्राप्ति होती है. फलों से अर्ध्य देकर विधि से हवन करें | खांड, घी, गेहूँ, शहद, जौ, तिल, नारियल, बिम्ब, दाख व कदम्ब आदि सामग्रियों से हवन संपन्न करें|

गेहूँ का हवन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति, खीर व चम्पा के फूलों से धन व पत्तों से तेज और सुख प्राप्त होता है. आँवले से कीर्ति और केले से पुत्र की प्राप्ति होती है. कमल से राज-सम्मान और दाखों से सुख संपत्ति मिलती है | खांड, घी, नारियल, शहद, जौ व तिल और फलों से होम करने से मनवाँछित वस्तु की प्राप्ति होती है| व्रत करने वाले को  क्रोध नहीं करना चाहिए और अंत में पंडित जी  को प्रणाम कर यथाशक्ति उसे दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए | इस महाव्रत को बताई विधि के अनुसार जो भी करता है उसके सारे मनोरथ पूरे होते हैं |

ब्रह्माजी कहते है – हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को इस व्रत की विधि व फल बताकर देवी अन्तर्ध्यान हो गई | जो मनुष्य इस व्रत को करता है वह इस लोक में सुख पाकर अंत में मोक्ष प्राप्त होता है | ब्रह्माजी फिर कहते हैं कि हे बृहस्पते! इस व्रत का माहात्म्य मैने तुम्हें बतलाया है! ब्रह्माजी का कथन सुन बृहस्पति आनन्द विभोर हो उठे और ब्रह्माजी जी से कहने लगे – हे ब्रह्माजी ! आपने मुझ पर अति कृपा की है जो आपने मुझे अमृत के समान इस नवरात्री व्रत का माहात्म्य सुनाया है |

 

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Post Author: Seema Gupta