नवरात्री के छटवे दिन देवी  माता ‘कात्यायनी’के रूप की पूजा का महत्व-Navaratri ke chhatave din devi kaatyaayanee ke roop kee pooja evm mahatv

 

Navaratri ke chhatave din devi  kaatyaayanee ke roop kee pooja evm mahatv

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एक समय की बात है बृहस्पति जीने ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मन ! आप अत्यंत बुद्धिमान, सर्वशास्त्र ज्ञानी और चारों वेदों को जानने वाले हैं| हे प्रभु कृपया कर मुझे बताये की चैत्र व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत क्यूँ किया जाता है? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? पहले इस व्रत को किसने किया ? बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले – हे बृहस्पते! तुमनेजग के कल्याण हेतु बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है| जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं वे मनुष्यसभी सुखो को भोगते हुए वकुंथ धाम को जाते है |

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नवरात्रि के नौ दिनों में से हर दिन का अलग महत्‍व होता है। हर दिन देवी मां के अलग स्‍वरूप की पूजा होती है और सभी की आराधना एक भिन्‍न भाव से की जाती है। माता को समर्पित सभी नौ दिन, मानवता के लिए होते हैं लेकिन विशेषताएं अलग होती हैं।

नवरात्रि वर्ष में चार बार पड़ती है- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन. नवरात्रि से वातावरण में तमस का अंत होता है और सात्विकता की शुरुआत होती है. मन में उल्लास, उमंग और उत्साह की वृद्धि होती है.

दुनिया में सारी शक्ति, नारी या स्त्री स्वरूप के पास ही है, इसलिए इसमें देवी की उपासना ही की जाती है.

नवरात्रि स्पेशल: पहले दिन देवी के शैलपुत्री स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्रि स्पेशल: दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्रि स्पेशल: तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा स्वरुप की पूजा का महत्व

नवरात्री के चौथे दिन कुष्मांडा देवी रूप की पूजा

नवरात्रि स्पेशल:नवरात्री के पंचम दिन देवी स्कंदमाता रूप की पूजा का महत्व

नवरात्री के छटवे दिन देवी  माता ‘कात्यायनी’के रूप की पूजा का महत्व

छंठवां दिन- नवरात्रि के छठें दिन, मां कात्‍यायनी की पूजा की जाती है। मां कात्‍यायनी, शेर पर सवार होती है और उनके चार हाथ व तीन आंखें होती हैं।
मां कात्यायनी का जन्म महर्षि कात्यायन के घर हुआ था. महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने खुद उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था. नवरात्र के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा की जाती है. मान्यता है कि अविवाहित कन्याएं अगर मां कात्यायनी देवी की पूजा करती हैं, तो उनके विवाह का योग जल्दी बनता है. जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो उनके लिए कात्यायनी देवी के मंत्र का जप अति लाभदायक होता है.

सभी देवियों में मां कात्यायनी को सबसे फलदायिनी माना जाता है. इनका वाहन सिंह है और इनकी चार भुजाएं हैं,

मां कात्यायनी से जुड़ी कथा 

यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा द‍िए गए सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। परंपरागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई है। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी में उनकी पूजा की जाती है। दरअसल, उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से मां के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

मां कात्यायनी का जन्म मह्रिषी कात्यायन के घर हुआ था। मह्रिषी कात्यायन के घोर तपस्या करके मां दुर्गा को प्रसन्न किया था। उसके पश्चात् मां दुर्गा से प्रसन्न होकर मह्रिषी को वरदान दिया कि वे उनके यहां पुत्री का जन्म लिया। इस कारण उनका नाम कात्यायनी रखा गया।

कात्यायनी पूजन सामग्री व मंत्र 

सूर्य अस्‍त के समय करें पूजा

मां कात्‍यायनी की पूजा सूर्यास्‍त के समय होती है. मां को पीले फूल और पीले रंग की मिठाई चढ़ाई जाती है. इसके अलावा मां को शहद भी चढ़ाया जाता है. नारियल, कलश, गंगाजल, कलावा, रोली, चावल, चुन्‍नी, शहद, अगरबत्ती, धूप, दीया और घी। साथ ही मां कात्यायनी को प्रसन्न करने के लिए 3 से 4 पुष्प लेकर निम्नलिखित मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए, उसके बाद उन्हें पुष्प अर्पित करना चाहिए

चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना । 
।। कात्यायनी शुभं दघा देवी दानव घातिनि ।

लाल रंग का महातम्‍य

परंपरागत रूप से मां कात्यायनी, देवी दुर्गा की तरह लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नौ दिन चलने वाले नवरात्रि उत्सव में षष्ठी के दिन में उनकी पूजा की जाती है। कहते हैं इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से मां के दर्शन भी प्राप्त हो सकते हैं।

 मंत्र:

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन। 

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

Post Author: Seema Gupta