दुर्गा अष्टमी एवं नवमी  की पूजा की विधि

दुर्गा अष्टमी एवं नवमी  की पूजा की विधि

दुर्गा अष्टमी एवं नवमी  की पूजा की विधि

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दुर्गा अष्टमी एवं नवमी  की पूजा की विधि और उसका हमारे जीवन में महत्व नवरात्री के दिनों में माता की पूजा के साथ- साथ ही व्रत उपासना और पूजन का विशेष महत्व होता हैं| जिस प्रकार से नवरात्रीमें मा के नौ दिनो में माँ दुर्गा के अलग- अलग स्वरूपों की पूजाअर्चना की जाती हैं उसी प्रकार इन नौ दिनों में माता को हर दिन अलग अलग मा के स्वरूप के मुताबिक़ भोग या प्रसाद अर्पित करने से भी सारी विपडाये दूर हो जाती है |माँ भगवती, गौरी.अम्बेआदि सभी नाम मा के ही है इनको भगवान् शिव की अर्धागिनी औरश्री गणेश जी की माता के रूप में जाना जाता हैं|इन दिनों में कुछ काम एसे भी होते है | जो हमे नवरात्रों के दिनों में नहीं करने चाहिए

वरात्र पर्व के आठवें और नौवें दिन कन्या पूजन और उन्हें घर बुलाकर भोजन जरुर करना चाहिए | दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन आखरी नवरात्रों में इन कन्याओ को नौ देवी स्वरुप मानकर इनका स्वागत किया जाता है | माना जाता है की इन कन्याओ को देवियों की तरह आदर सत्कार और भोज से माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती है और अपने भक्तो को सुख समृधि का वरदान दे जाती है |

दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन क्यों और कैसे किया

जाता है?

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नवरात्र पर्व (Navratri Festival) के दौरान कन्या पूजन का बडा महत्व है | नौ कन्याओं को नौ देवियों के रूप में पूजने के बाद ही भक्तो का नवरात्र व्रत पूरा होता है| अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्हें भोग लगाकर दक्षिणा देने मात्र से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों को उनका मनचाहा वरदान देती हैं | नवरात्रे में अष्टमी एवं नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है | दोनों दिन शुभ और श्रेष्ठ है |

कन्या पूजन विधि

जिन कन्याओ को कन्या भोज पर बुलाना है , उन्हें एक दिन पहले ही न्योता दे दे | गृह पर आने के बाद कन्याओ का पुरे परिवार के साथ पुष्प वर्षा से स्वागत करे और नव दुर्गा के सभी नौ नामो के जयकारा लगाये | अब इन कन्याओ को आरामदायक और स्वच्छ जगह बिठाकर इन सभी के पैरो को बारी बारी जल से भरे थाल या थाली में रखकर अपने हाथो से उनके पैरो को धोना चाहिए और पैर छुकर आशीर्वाद लेना चाहिए | उसके बाद पैरो पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए | फिर माँ भगवती का ध्यान करके इन देवी रुपी कन्याओ को इच्छा अनुसार भोजन कराये | भोजन के बाद कन्याओ को अपने सामर्थ के अनुसार दक्षिणा एवं उपहार देकर उनके पुनः पैर छूकर आशीष ले |

नवरात्र पर्व पर कन्याभोज में कितनी हो कन्याओं की उम्र ?

कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष तक होनी चाहिए और इनकी संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए | यदि 9 से ज्यादा कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति नहीं है |

ये दिन सिर्फ सिर्फ 9 दिन ही नहीं है यह कन्या 9 देवियाँ :

नवरात्रों में भारत में कन्याओ को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है पर कुछ लोग नवरात्रि के बाद यह सब भूल जाते है | बहूत जगह कन्याओ पर शोषण होता है , उनका अपनाम किया जाता है | आज भी भारत में बहूत सारे गाँवों में कन्या के जन्म पर दुःख मनाया जाता है | ऐसा क्यों | क्या आप देवी माँ के इन रूपों को क्यों ऐसा अपमान करते है | हर कन्या अपना भाग्य खुद लेकर आती है | कन्याओ के प्रति हमहें हम्हारी सोच बदलनी पड़ेगी | यह देवी तुल्य है | इनका सम्मान करना इन्हे आदर देना ही ईश्वर की पूजा के तुल्य है |

Post Author: Seema Gupta