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गणेश चतुर्थी व्रत कथा

माघ की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को गणेश चतुर्दशी कहते है | गणेश चतुर्थी  महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश पश्चिमी और दक्षिणी भारत में मुख्य रूप में मनाया जाता है | माता पारवती जी के पुत्र गणेश जी को सबसे पहले पूजनीय माना गया है | कोई भी सुभ काम सुरु करने से पहले गणेश जी की आराधना की जाती है |  ये व्रत बहुत ही फलदायी होता है |  जो लोग इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करते है | उनके सब दुःख दूर हो जाते है | गणेश जी की कृपा उन भक्तो पर हमेशा बनी रहती है | इसलिए गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है |

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा –

एक बार की बात है शिव और पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थे | तभी पार्वती जी के मन में चोपढ  खेलने का विचार आया | और दोनों ही चोपड़ खेलने के लिए तोयार हो गये | लेकिन हार जीत का फैसला करने वाला कोई नही था | तब पार्वती जी ने कुछ घास और मिटटी एकत्र की और एक पुतला बनाया | जिसमे उन्होंने प्राण डाल दिए | और शिव जी ने बालक से कहा की हम चोपड़ खेल रहे है | और तुम हार जीत का फैसला करना |

अब शिव और पार्वती जी चोपड़ खेलने लगते है | और लगातार तीन बार पार्वती जी की जीत होती है |  लेकिन भगवान् शिव अपनी हार मानने को तैयार नही थे | तभी शिव और पार्वती जी बालक से पूछते है | तो बालक तीनो बार शिवजी की जीत बताता है | तब पार्वती जी को गुस्सा आ जाता है |तब पार्वती जी बालक को एक पैर से लंगड़ा और कीचड़  में पढ़े रहकर दुःख भोगने का श्राप देती है |

बालक एक दम विचलित होकर डर गया और माँ पार्वती जी से छमा मांगने लगा और कहने लगा की माता मुझे छमा कर दो | मुझसे  अज्ञानतावश ऐसा हुआ है | मेने किसी द्वेश में आकर ऐसा नही किया | मुझे इस श्राप से बचने का कोई उपाय बताये | माता पार्वती को पुत्र को देखकर दया आ गयी | तब पार्वती जी बालक से कहती है की यहाँ गणेश पूजन के लिए नाग कन्या आएगी | उनके उपदेश से गणेश व्रत करके तुम मुझे प्राप्त करोगे | ऐसा कहकर माता पार्वती शिवजी के साथ कैलाश पर्वत चली गयी |

एक वर्ष पश्चात् उस स्थान पर नाग कन्या आई | तभी बालक ने नाग कन्या से गणेश जी के व्रत की विधि पूछी और लगातार २१ दिन तक गणेश जी का व्रत किया | गणेश जी बालक की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने बालक को दर्शन दिए और बालक से कोई भी वर मांगने के लिए कहा | तब बालक ने भगवान् गणेश से कहा की आप मेरे सभी दुःख दूर करदे और मेरे पैरो को इतनी शक्ति प्रदान करे की मै  स्वयं अपने पैरो से चलकर कैलाश पर्वत पर जा सकू | और वो मुझसे खुश हो जाये |

भगवान् गणेश ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान होकर वहा से चले गये | बालक ठीक हो गया और अपने पैरो पर चलकर कैलाश पर्वत पहुँच गया | यह पूरी कथा बालक ने शिव जी को सुनाई | तभी से माता पार्वती महादेव से रुष्ट हो गयी | तब महादेव ने भी उसी बालक की तरह लगातार २१ दिन तक गणेश जी का व्रत किया | व्रत के प्रभाव से ही पार्वती के मन में शंकर जी से मिलने की इच्छा जाग उठी |

माता पार्वती स्वयं ही आकर महादेव से मिली | और माता ने महादेव से पूरी कहानी के बारे में पूछा – तब महादेव ने माता को सारी कथा सुनाई | ये सब सुनकर माता के मन में अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागी |

फिर पार्वती ने भी लगातार २१ दिन तक दुवा , पुष्प और लड्डू से भगवान गणेश का विधि पूर्वक व्रत किया | तदुपरांत २१ दिन बाद कार्तिकेय स्वयं कैलाश पर माता से मिलने आया | इसी प्रकार गणेश व्रत  की आगे चलती रही और तभी से गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत मन गया है | ऐसे है भगवान गणेश जो सबके दुःख हरने वाले और सबकी मनोकामना पूरी करने वाले है|

ये है भगवान गणेश की पूरी कथा | जिसे सुनकर आप भी हैरान हो जायेंगे और भगवान गणेश का व्रत रखने लगेंगे | अगर आप भि अपने सभि ‍‍‌कष्टों से मुक्ति चाहते है तो आप भी श्री गणेश का व्रत करे |

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Post Author: Pooja Aggarwal