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कैकई ने भगवान् राम को क्यों भेजा वनवास ( रोचक कथा )

जय श्री राम ! दोस्तों आज हम आपको पर  बहुत ही रोचक रहस्ह्मय कथा बताने जा रहे है | जिसमे हमने अयोध्या   के  राजा दशरथ की तीसरी पत्नी कैकई दुवारा राम को वनवास भेजने के विषय में एक रहस्यमय कथा का विस्तार से  बहुत ही सुंदर शब्दों में वर्णन किया है |आगे पढ़े –

एक बार की बात हे अयोघ्या के राजा दशरथ का मुकाबला किशक्न्धा के राजा बाली से हुआ |राजा दशरथ  की तीनो रानियों में सबसे छोटी रानी कैकई को अस्त्र – शस्त्र ओर रथ चलाने का ज्ञान था |इस लिये राजा दशरथ के साथ कई बार केकई युद्ध में साथ जाती थी |जब राजा दशरथ व बाली की आपस में भिड़त हुई तो उस समय संयोग वस केकई राजा दशरथ के साथ ही थी |पर बाली को वरदान था की जिस पर उस की दृष्टि पढ़ जाए, उस योद्धा का आधा बल उसे प्राप्त हो जाता था |

स्वभाविक है की राजा दशरथ बाली के सामने युद्ध करने गये तो उनका आधा बल उस ( बाली )को प्राप्त हो  गया और इसी कारण राजा दशरथ परास्त हो गये |तब बाली ने राजा दशरथ के सामने शर्त रखी की पराजय के मूल स्वरूप या तो अपनी प्रिय रानी कैकई को छोड़ जाओ या फिर अपने  रघुकुल वंश का अपना राज मुकुट  छोड़ जाओ | परन्तु राजा दशरथ ने रानी कैकई के स्थान पर अपना राज मुकुट बाली के  पास छोड़ दिया | रानी कैकई राजा दशरथ के राज मुकुट की वापसी के चिंतन में रहती थी | जब राजा दशरथ के चारों पुत्रों  राम , भरत , लक्स्मन और शत्रुघन बड़े हो गये और उन्होंने  शिक्षा प्राप्त की तथा मिथला की चारों राजकुमारीयों का विवाह करके अयोध्या आये | कुछ समय बीत जाने के पश्चात श्री राम जी का राज तिलक का समय आया | तब राजा दशरथ और रानी कैकई में मुकुट को लेकर विचार विमर्श हुआ | इस बात को केवल यही दोनों ( दशरथ और कैकई ) जानते थे |

कैकैई ने रघुकुल वंश की आन – मान – शान  राजमुकुट को वापस लाने के लिए अपने प्रिय ज्येष्ठ पुत्र राम को वनवास भेजने का कलंक अपने ऊपर ले लिया और पुत्र राम को १४ वर्ष का वनवास हेतु वन भेज दिया | बाद में कैकई ने  श्री राम से कहा — हे पुत्र ! किसकिन्धा का राजा बाली से रघुवंश का राज मुकुट  वापस लेकर अयोध्या आना है  |

श्री राम ने जब बाली को मारा तब अंतिम समय राम और बाली के बीच आपस में  सम्वाद होने लगा | तब प्रभु ने अपना परिचय दिया और अपने कुल के राज मुकुट के विषय में पूछा |

बाली ने बताया की जब रावण को मेने बंदी बनाया था | वह भागा तो छलपूर्वक राज मुकुट को भी लेकर भाग गया | अब राज मुकुट उसी के पास है |

बाली ने श्री राम से आग्रह किया की हे प्रभु ! आप मेरे पुत्र अंगद को अपनी शरण में ले लीजिये  | यह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपके कुल का राज मुकुट लेकर आएगा |

जब अंगद श्री राम जी का दूत बनकर लंका में रावन की सभा में गये | तो वहां उन्होंने सभा में अपना पैर जमा दिया और सभी सुरविरों को अपने पैर उठाने की चुनोती दे दी |जिससे रावन के सभा में सभी सुरवीर हार गये | अंत में रावन स्वयं आया जेसे ही रावन ने अंगद के पैर पकड़ कर हिलाना चाहा | तभी  रावन के शीश से मुकुट गिर गया | जिसे चतुराई से अंगद ने श्री राम जी के पास सुरक्षित पहुँचाया |

आपको ये कथा कि सच्चाई जानकर हैरानी होगी की माता कैकई का राम को वनवास भेजने के पीछे  का तात्पर्य भरत को अयोध्या का राजा बनाना नहीं था | अपितु अपने पति और रघुकुल वंश की आन – मान – शान राज मुकुट को राम दुवारा वापस लाना था | जिसके लिए कैकई ने सारे कलंक अपने सर ले लिए थे |

Post Author: Pooja Aggarwal